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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद निकाले गए प्रोफेसर को हाईकोर्ट से बड़ी राहत

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद निकाले गए प्रोफेसर को हाईकोर्ट से बड़ी राहत

अक्सर ऐसा माना जाता है कि शिक्षक की आवाज़ को दबाना आसान होता है, लेकिन जब बात न्याय और हक की हो, तो कानून का डंडा हर मनमानी पर भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला है उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में, जहाँ बहेड़ी के प्रतिष्ठित गन्ना उत्पादक स्नातकोत्तर महाविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहित भारद्वाज को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से एक बहुत बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके निष्कासन के आदेश को सिरे से खारिज कर दिया है।

क्या था पूरा मामला? क्यों हुई थी कार्रवाई?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब वाणिज्य विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहित भारद्वाज ने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया था। यह प्रदर्शन विद्यार्थियों और युवाओं से जुड़े विभिन्न गंभीर मुद्दों को लेकर था। एक शिक्षक होने के नाते डॉ. भारद्वाज ने युवाओं के समर्थन में इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

हालांकि, उनका यह कदम महाविद्यालय प्रबंधन को रास नहीं आया। प्रबंधन ने इसे अपनी नीतियों और नियमों के खिलाफ मानते हुए कड़ा कदम उठाया और 22 जुलाई को डॉ. भारद्वाज के खिलाफ सीधा निष्कासन आदेश जारी कर दिया। एक झटके में नौकरी जाने से академиक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई थी, क्योंकि डॉ. भारद्वाज समाजवादी युवजन सभा बरेली के जिलाध्यक्ष भी हैं।

हाईकोर्ट में टिकी उम्मीदें, वकीलों ने रखी मजबूत दलील

महाविद्यालय प्रशासन के इस एकतरफा और दंडात्मक फैसले के खिलाफ झुकने के बजाय, डॉ. मोहित भारद्वाज ने न्याय की राह चुनी। उन्होंने अपने विद्वान अधिवक्ताओं बिपिन शर्मा और अभिनव मिश्रा के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

दायर की गई रिट याचिका (रिट-ए संख्या 11782/2026) में कई बड़े पक्षों को प्रतिवादी बनाया गया था, जिनमें शामिल हैं:

  • उत्तर प्रदेश सरकार
  • रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति
  • जिलाधिकारी (डीएम) बरेली
  • जिला गन्ना अधिकारी
  • प्राचार्य और प्रबंधक, गन्ना उत्पादक महाविद्यालय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद महाविद्यालय प्रबंधन के 22 जुलाई के निष्कासन आदेश को पूरी तरह से निरस्त (रद्द) कर दिया।

'सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं' - डॉ. मोहित भारद्वाज

हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद डॉ. मोहित भारद्वाज ने राहत की सांस ली और न्यायपालिका के प्रति अपना अटूट विश्वास जताया। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा,

"मैंने हमेशा सत्य और न्याय पर विश्वास किया है। बेशक यह समय मेरे और मेरे परिवार के लिए बहुत कठिन था, लेकिन मेरा हौसला और विश्वास नहीं टूटा। आज अदालत से मिली यह राहत मेरे लिए न्याय की जीत है।"

उन्होंने आगे कहा कि एक शिक्षक होने के नाते विद्यार्थियों के भविष्य और उनकी वाजिब आवाज़ के साथ खड़ा होना उनकी नैतिक जिम्मेदारी थी। यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिकारों के संरक्षण की थी। उन्होंने इस संघर्ष के दौरान उनके साथ खड़े रहने वाले तमाम विद्यार्थियों, अपने शिक्षक साथियों और अधिवक्ताओं का हृदय से आभार व्यक्त किया।


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इस फैसले के दूरगामी मायने क्या हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालय का यह फैसला केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी प्रतीक है कि शिक्षण संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों और शिक्षकों को वैचारिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। शांतिपूर्ण तरीके से किसी छात्र आंदोलन का समर्थन करना कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए बिना पुख्ता कानूनी प्रक्रिया के किसी असिस्टेंट प्रोफेसर को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. डॉ. मोहित भारद्वाज कौन हैं और वे किस कॉलेज में कार्यरत हैं?

डॉ. मोहित भारद्वाज बहेड़ी के गन्ना उत्पादक स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वाणिज्य विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और वे समाजवादी युवजन सभा बरेली के जिलाध्यक्ष भी हैं।

2. उन्हें क्यों निष्कासित किया गया था?

उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं के समर्थन में हुए एक आंदोलन में हिस्सा लिया था, जिसके चलते महाविद्यालय प्रबंधन ने अनुशासनात्मक कार्रवाई का हवाला देते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया था।

3. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए 22 जुलाई को जारी किए गए उनके निष्कासन आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है, जिससे उन्हें बड़ी कानूनी राहत मिली है।

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रिपोर्टर: Anuradha Dubey

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